गौकरण और धुंधकारी की कथा सुन भावुक हुए श्रोता।

संवाददाता: मनीष राजपूत
औरैया
औरैया जनपद के फफूंद क्षेत्रांतर्गत शिबूपुर धाम में 19 जून दिन शुक्रवार से अध्यात्म का महाकुंभ के प्रथम दिवस की कथा ने गौकरण और धुंधकारी की कथा सुन भावुक हुए जहां एक भाई की प्रेत आत्मा को दूसरे भाई ने भाव से पार किस प्रकार लगाता है आइए सुनते हैं इस कथा में
तुंगभद्रा नदी के किनारे आत्मदेव नाम के एक विद्वान ब्राह्मण अपनी पत्नी धुंधुली के साथ रहते थे। নিঃসंतन होने के कारण वे बहुत दुखी रहते थे। एक संन्यासी की कृपा से उन्हें फल प्राप्त हुआ, लेकिन पत्नी के आलस्य और भय के कारण वह फल एक गाय ने खा लिया। परिणामस्वरूप, गाय से गोकर्ण (ज्ञानी और पवित्र) और पत्नी के षड्यंत्र से धुंधुकारी (अत्यंत क्रोधी और पापी) का जन्म हुआ।बड़ा होकर धुंधुकारी जुआरियों और दुष्टों की संगति में पड़ गया। उसने अपनी सारी संपत्ति नष्ट कर दी और अपने माता-पिता के साथ भी क्रूरता की। तंग आकर आत्मदेव ने वन में शरण ली। बाद में धुंधुकारी ने धन के लालच में अपनी माँ और फिर पाँच वेश्याओं के साथ मिलकर अपनी ही हत्या कर दी।पाप कर्मों के कारण धुंधुकारी की मृत्यु के बाद उसे प्रेत योनि प्राप्त हुई और वह हवा में भटकने लगा। उसका भाई गोकर्ण अब एक महान ज्ञानी बन चुका था। जब गोकर्ण को धुंधुकारी की दुर्गति का पता चला, तो उसने विद्वान ब्राह्मणों की सहायता से श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया।गोकर्ण ने धुंधुकारी की आत्मा की मुक्ति के लिए सात दिन तक कथा सुनाई। धुंधुकारी ने प्रेत रूप में आकर कथा के सातों दिन सात गाँठ वाले बाँस के पोरों में आश्रय लिया। कथा समाप्त होते ही बाँस की सातों गाँठें फूट गईं और धुंधुकारी प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य रूप में वैकुंठ धाम चला गया。
ईश्वर की आप सभी पर यसीम कृपा बनी रहेगी।




