हरिद्वार की पावन धरती से पूर्व जिलाधिकारी डॉ. दिनेश चंद्र ने साझा कीं पुरानी स्मृतियां।

हरिद्वार
मां गंगा की अविरलता, स्वच्छता और पवित्रता बनाए रखने का लिया संकल्प; युवाओं को संघर्ष से प्रेरणा लेने का दिया संदेश
संयुक्त उत्तर प्रदेश के दौर से ही हरिद्वार से गहरा आत्मीय और प्रशासनिक संबंध रखने वाले पूर्व जिलाधिकारी डॉ. दिनेश चंद्र ने रविवार, 13 सितंबर 2026 को मां गंगा के पावन तट पर पहुंचकर पुरानी स्मृतियों को ताजा किया। उन्होंने हरिद्वार की धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक महत्ता का उल्लेख करते हुए मां गंगा की अविरल धारा, स्वच्छता और पवित्रता को नमन किया। साथ ही लोगों से गंगा को प्रदूषण से बचाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसकी निर्मलता बनाए रखने का आह्वान किया।
डॉ. दिनेश चंद्र ने कहा कि हरिद्वार से उनका रिश्ता विशेष रूप से आत्मीय है, क्योंकि उनका संबंध जनपद बिजनौर से है। उन्होंने बताया कि प्रमाणिक रूप से यह तथ्य सामने आता है कि हरिद्वार की हर की पौड़ी का कुछ अंश पूर्व में जनपद बिजनौर की भौगोलिक सीमाओं में रहा है। समय के साथ विकास की गति बढ़ी और बाद में उत्तर प्रदेश का विभाजन हुआ, जिसके फलस्वरूप हरिद्वार उत्तराखंड का हिस्सा बन गया।
उन्होंने अपनी प्रशासनिक सेवा की स्मृतियों को साझा करते हुए बताया कि उत्तर प्रदेश के विभाजन से ठीक पहले लगभग तीन वर्षों तक उन्हें उपजिलाधिकारी हरिद्वार, लक्सर आदि के रूप में कार्य करने और इस क्षेत्र में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। यही कारण है कि हरिद्वार की धरती, यहां की गंगा और यहां के लोगों से जुड़ी अनेक पुरानी स्मृतियां आज भी उनके मन में जीवंत हैं।
देवभूमि हरिद्वार की आध्यात्मिक महत्ता
पूर्व जिलाधिकारी ने कहा कि हरिद्वार केवल एक धार्मिक नगर नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या, साधना और सनातन संस्कृति की जीवंत भूमि है। साधु-संतों की तपस्या से पवित्र हुई इस धरती पर मां गंगा के किनारे पूजा-अर्चना और स्नान करना हमारी सनातन परंपरा और संस्कृति का विशद एवं ऐतिहासिक प्रमाण है।
उन्होंने मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की पौराणिक कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि राजा भगीरथ की दीर्घ तपस्या के फलस्वरूप भगवान शिव की जटाओं से मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं। उनके अवतरण का उद्देश्य केवल एक धार्मिक कथा तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव जीवन, समाज और प्रकृति के कल्याण की व्यापक भावना से जुड़ा हुआ है। मां गंगा अपनी अविरल धारा के माध्यम से लोककल्याण, जनकल्याण और प्रकृति के संरक्षण का संदेश देती हैं।
श्यामपुर घाट पर पहुंचकर 28 वर्ष पुरानी स्मृतियां हुईं ताजा
13 सितंबर को मां गंगा के तट स्थित श्यामपुर घाट पहुंचने पर डॉ. दिनेश चंद्र भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि श्यामपुर से उनकी अनेक पुरानी स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। लगभग 28 वर्ष पुरानी घटनाओं को याद करते हुए उन्होंने बताया कि श्यामपुर थाने के अभिलेखों में डाकू सुल्ताना से संबंधित उल्लेख भी मिलता है।
उन्होंने उस दौर के प्रशासनिक अनुभवों को याद करते हुए कहा कि उस समय श्री आर.पी. सिंह उनके प्रथम जिलाधिकारी रहे और उनके बाद आराधना शुक्ला ने जिलाधिकारी के रूप में कार्य किया। श्यामपुर गांव में आयोजित चौपाल की स्मृति भी आज तक उनके मन में बनी हुई है। समय भले ही करीब तीन दशक आगे बढ़ गया हो, लेकिन जीवन में घटित अच्छी और सार्थक घटनाओं की स्मृतियां सदैव मन में जीवित रहती हैं।
कटान और बाढ़ की समस्या से विकास तक का सफर
डॉ. दिनेश चंद्र ने बताया कि पूर्व में गंगा के किनारे कटान के कारण वर्षा ऋतु में आसपास के गांवों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। बाढ़ और कटान से जनजीवन प्रभावित होता था तथा ग्रामीणों को कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता था।
उन्होंने कहा कि समय के साथ आधुनिक सुविधाओं और विकास की अवधारणा ने परिस्थितियों को बदला है। तटबंधों और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं में सुधार हुआ है। उन्होंने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान में तटबंध अधिक सुरक्षित हैं और क्षेत्र में बाढ़ के प्रभाव को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हुआ है।
मां गंगा की स्वच्छता के लिए लोगों से किया आह्वान
हरिद्वार प्रवास के दौरान डॉ. दिनेश चंद्र ने मां गंगा को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए कहा कि वह मां गंगा की जीवंतता, उनकी अविरलता, उनकी स्वच्छता और उनकी पौराणिक महत्ता को प्रणाम करते हैं। सनातन परंपरा और शास्त्रों में मां गंगा को पाप-पुण्य और मोक्ष से जुड़ी आस्था का प्रतीक माना गया है।
उन्होंने कहा कि मां गंगा के प्रति हमारी आस्था तभी सार्थक होगी, जब हम उनकी स्वच्छता की जिम्मेदारी भी समझेंगे। उन्होंने लोगों से संकल्प लेने का आह्वान किया कि ऐसी कोई भी सामग्री गंगा में प्रवाहित न की जाए, जिससे नदी का जल या पर्यावरण प्रदूषित हो और मां गंगा का आंचल मैला हो।
उन्होंने कहा कि मां गंगा स्वयं जीवनदायिनी हैं। हमारा दायित्व है कि हम अपनी गतिविधियों से उनकी पवित्रता और पर्यावरणीय संतुलन को नुकसान न पहुंचाएं।
युवाओं से कहा- बाधाओं से घबराएं नहीं, गंगा से लें प्रेरणा
पूर्व जिलाधिकारी डॉ. दिनेश चंद्र ने युवाओं और विद्यार्थियों के लिए भी प्रेरणादायी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में बाधाएं आना स्वाभाविक है। विद्यार्थियों और युवाओं के सामने भी कभी-कभी निराशा और कठिन परिस्थितियां आती हैं, लेकिन ऐसे समय में उन्हें प्रकृति और मां गंगा से प्रेरणा लेनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि मां गंगा निरंतर आगे बढ़ती हैं। रास्ते में कितनी भी बाधाएं आएं, उनकी धारा अपना मार्ग बनाती हुई आगे बढ़ती रहती है। इसी प्रकार मनुष्य को भी कठिनाइयों से घबराने के बजाय निरंतर प्रयास करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए।
*उन्होंने प्रसिद्ध पंक्तियों—*
“ *लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,*
*कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।”*
—का उल्लेख करते हुए युवाओं से जीवन में निरंतर प्रयास, अनुशासन और सकारात्मक सोच बनाए रखने की अपील की।
*स्वच्छ गंगा और स्वस्थ समाज का संकल्प*
डॉ. दिनेश चंद्र ने कहा कि मां गंगा केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी जीवनदायिनी धारा हैं। इसलिए गंगा की स्वच्छता केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
उन्होंने कहा कि यदि समाज सामूहिक रूप से यह संकल्प ले कि गंगा में कूड़ा, प्लास्टिक, पूजन सामग्री अथवा अन्य प्रदूषणकारी वस्तुएं नहीं डाली जाएंगी, तो गंगा की निर्मलता को बनाए रखने में बड़ा योगदान दिया जा सकता है।
हरिद्वार प्रवास के दौरान डॉ. दिनेश चंद्र ने मां गंगा के तट से जुड़े विभिन्न दृश्यों और स्मृतियों को तस्वीरों के माध्यम से भी साझा किया। उन्होंने कहा कि ये तस्वीरें केवल प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण नहीं हैं, बल्कि अतीत की स्मृतियों, वर्तमान की विकास यात्रा और भविष्य के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी देती हैं।
अंत में उन्होंने सभी से मां गंगा की पवित्रता बनाए रखने, प्रकृति के संरक्षण और युवाओं को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाने के लिए सामूहिक प्रयास करने का आह्वान किया और कहा—“आइए, मिलकर हम सब प्रयास करें। मां गंगा से प्रेरणा लें और निरंतर आगे बढ़ें। जय हिंद, जय भारत।”




